बड़ी कामयाबी: अब प्लास्टिक कचरे से दौड़ेंगी गाड़ियां, गति शक्ति विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का बड़ा आविष्कार
'प्लास्टो-पेट्रोल' का ट्रायल सफल; 100cc बाइक ने दिया 60 किमी का शानदार माइलेज, प्रदूषण जांच में भी पास।

VIDYA SAGAR -29/06/2026
वडोदरा।
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देश में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण और महंगे होते ईंधन की समस्या से निपटने के लिए वडोदरा स्थित गति शक्ति विश्वविद्यालय (GSV) के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी तकनीक खोज निकाली है। वैज्ञानिकों ने बेकार पड़े प्लास्टिक कचरे को सफलतापूर्वक पेट्रोल और डीजल में बदल दिया है। इस अनोखे ईंधन को ‘प्लास्टो-पेट्रोल’ नाम दिया गया है, जिसका शुरुआती ट्रायल पूरी तरह सफल रहा है।
तीन प्रमुख मोटरसाइकिलों पर हुआ सफल ट्रायल
इस तकनीक की विश्वसनीयता को परखने के लिए देश की बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों की तीन मोटरसाइकिलों में इस ‘प्लास्टो-पेट्रोल’ का इस्तेमाल किया गया। ट्रायल के नतीजे बेहद चौंकाने वाले और उम्मीद से बेहतर रहे।
शानदार माइलेज:
टेस्ट के दौरान एक लोकप्रिय 100cc की बाइक को जब इस ईंधन से चलाया गया, तो उसने 1 लीटर में 60 किलोमीटर का शानदार माइलेज दिया। सामान्य पेट्रोल पर यही बाइक लगभग 62 किलोमीटर का माइलेज देती है, यानी प्लास्टो-पेट्रोल का परफॉर्मेंस आम पेट्रोल के बेहद करीब है।
इंजन पर कोई बुरा असर नहीं:
ट्रायल के दौरान गाड़ियों के पिक-अप और इंजन की कार्यक्षमता में कोई कमी नहीं देखी गई।
पर्यावरण के अनुकूल: प्रदूषण जांच (PUC) में पास
इस आविष्कार की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरण के अनुकूल होना है। आम तौर पर प्लास्टिक के जलने से हानिकारक गैसें निकलती हैं, लेकिन इस तकनीक से बने प्लास्टो-पेट्रोल से चलने वाले वाहनों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच (PUC) को आसानी से पास कर लिया। इसका मतलब है कि यह ईंधन पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचा रहा है।![]()
भविष्य की राह और फायदे
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर लॉन्च किया जाता है, तो इसके दोहरे फायदे होंगे:
प्लास्टिक संकट से मुक्ति:
शहरों में डंपिंग यार्ड का सिरदर्द बन चुके प्लास्टिक कचरे का सही रीसाइक्लिंग मॉडल तैयार होगा।
कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी:
भारत को दूसरे देशों से आयात होने वाले महंगे कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
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गति शक्ति विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की इस सफलता ने भारत में ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ (कचरे से कंचन) के सपने को सच कर दिखाया है। अब देखना यह होगा कि यह तकनीक आम जनता के लिए पेट्रोल पंपों तक कब तक पहुंचती है।



