लेटस्ट न्यूज

सरस्वती विद्या मंदिर घुमारवीं में नमामि भारतम् के अन्तर्गत वन्दे मातरम् राष्ट्र गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य पर सामूहिक गायन का कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता व मुख्य अतिथि विश्व हिन्दू परिषद् जिला बिलासपुर के जिला मंत्री विशाल नड्डा रहे।साथ में संवेदना संस्था सचिव सत्यन शर्मा, विश्व हिन्दू परिषद् जिला प्रचार-प्रसार प्रमुख लक्की शर्मा, विश्व हिन्दू परिषद् घुमारवीं नगर उपाध्यक्ष प्रवीण धीमान, विश्व हिन्दू परिषद् घुमारवीं नगर मन्त्री प्रिन्स ठाकुर व भाजपा आईटी सेल जिला संयोजक अजीत विशेष आमंत्रित सदस्य रहे।

Advertisement

25 सितम्बर, 2026

(Viren Thakur)

इस कार्यक्रम में सरस्वती विद्या मंदिर घुमारवीं की प्रबंधक समिति के अध्यक्ष चमन कपूर, कोषाध्यक्ष कंचन भट्टी, प्रधानाचार्या तृप्ता चन्देल, विद्यालय के सभी अध्यापक व समस्त विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत प्रातः वन्दना से प्रारंभ हुई। विद्यालय के अध्यापक अमन पराशर ने वंदे मातरम के इतिहास और नमामि भारतम् के विषय पर बच्चों को जानकारी दी ।इसके बाद मुख्य वक्ता विशाल नड्डा ने वंदे मातरम और नमामि भारतम् कार्यक्रम के इतिहास की जानकारी देते हुए बताया कि 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने राष्ट्रीय विचारों को कुछ पंक्तियों में पिरोया जो स्वतंत्रता आंदोलन का मूल मंत्र बन गया वही वंदे मातरम कहलाया। वंदे मातरम केवल मात्र एक गीत का मुखड़ा नहीं है यह उस भारत भूमि को प्रणाम है जिसने हमें जन्म दिया, जिसने हमें अन्न दिया, जिसने हमें जल दिया, जिसने हमें संस्कार दिए और जिसने हमें अपनी गोद में पालकर मनुष्य से राष्ट्रभक्ति बनने का अवसर दिया।

आज हम वंदे मातरम के डेढ़ सौ वर्ष की यात्रा को स्मरण कर रहे हैं तो हमें यह समझना होगा कि किसी रचना की महानता केवल उसके शब्दों में नहीं होती महता तब होती है जब शब्द समय की चेतना बन जाते हैं। 7 नवंबर 1875 को वंदे मातरम का प्रकाशन बंग दर्शन में हुआ। इसके बाद 1882 में बंकिम चंद्र जी के प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ का यह हिस्सा बना लेकिन यह समझना आवश्यक है कि वंदे मातरम की आत्मा केवल किसी एक उपन्यास की कथा तक सीमित नहीं थी इसके भीतर भारत भूमिका एक विराट दर्शन था। सुजलाम, सुफलाम, शस्य श्यामलाम अर्थात जल से समृद्ध, फल से समृद्ध, अन्न से परिपूर्ण हरियाली से आच्छादित मां के रूप में भारत। यहां भारत केवल भूगोल नहीं है यहां भारत माता है और जब राष्ट्र भूमि से उठकर माता बन जाती है तब उसके प्रति हमारा संबंध केवल अधिकार का नहीं रहता कर्तव्य का हो जाता है। आज के कार्यक्रम में सभी से निवेदन किया गया की डेढ़ सौ वर्षो की इस महान यात्रा के साक्षी बनाकर हम संकल्प लें कि जीवन पर्यंत भारत माता का सम्मान करते रहेंगे, भारत की संस्कृति का सम्मान करेंगे, भारत के संविधान और राष्ट्रीय मूल्यों का सम्मान करेंगे। अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे। राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए सदैव तत्पर रहेंगे और समर्पित रहेंगे और आने वाली पीढियां के हृदय में भारत के प्रति गौरव और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का दीप जलाते रहेंगे क्योंकि जब करोड़ों कंठ एक साथ कहते हैं वंदे मातरम तो केवल एक गीत नहीं गूंजता एक राष्ट्र जागता है। पूरे गर्व के साथ पूरे राष्ट्रीय भाव के साथ अपनी भारत माता को नमन करते रहें।

 

Advertisement

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button