आधुनिकता की दौड़ से दूर: झारखंड के जंगलों में ‘पत्थर युग’ जैसी सादगी से जी रहे हैं 75 वर्षीय सुरेंद्र सोरेन
परिवार को खोने के गम में छोड़ी दुनिया की चकाचौंध; पिछले 25 वर्षों से टुंडी के घने जंगलों में मिट्टी के घर को ही बना लिया अपना संसार

24/05/2026- VIDYA SAGAR
धनबाद (झारखंड): आज की आधुनिक और भागदौड़ भरी 5G दुनिया में जहाँ लोग मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और तकनीक के बिना एक पल भी रहने की कल्पना नहीं कर सकते, वहीं एक शख्स ऐसा भी है जिसने इस चकाचौंध से पूरी तरह दूरी बना ली है। झारखंड के धनबाद जिले के टुंडी क्षेत्र के घने जंगलों में रहने वाले 75 वर्षीय सुरेंद्र सोरेन पिछले 25 सालों से प्रकृति की गोद में एक बिल्कुल अलग और सरल जीवन जी रहे हैं।
सुरेंद्र सोरेन की यह जिंदगी किसी ‘पत्थर युग’ जैसी प्रतीत होती है, जहाँ न बिजली है, न नल का पानी और न ही कोई आधुनिक सुख-सुविधा। उनके पास रहने के लिए मिट्टी और लकड़ी से बनी एक छोटी सी झोपड़ी है, जिसे ही उन्होंने अपनी पूरी दुनिया मान लिया है।
अपनों को खोने के गम ने बदला जिंदगी का रास्ता
स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, सुरेंद्र सोरेन हमेशा से ऐसे नहीं थे। वे भी कभी मुख्यधारा के समाज का हिस्सा थे। लेकिन जीवन में आए एक बड़े व्यक्तिगत संकट ने उनकी दुनिया बदल दी। एक हादसे या बीमारी में उन्होंने अपनी पत्नी और दो बेटों को हमेशा के लिए खो दिया। इस गहरे सदमे और अकेलेपन के बाद, उन्होंने समाज और शहरों की भीड़भाड़ से पूरी तरह दूरी बना ली और खुद को प्रकृति के हवाले कर दिया।
जंगल के संसाधनों पर ही निर्भर, सादगी और आत्मसम्मान की मिसाल
पिछले ढाई दशकों से सुरेंद्र सोरेन पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं। वे खाने-पीने के लिए जंगल से मिलने वाले फल-फूल, कंदमूल और पारंपरिक खेती पर निर्भर हैं। सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कर आग जलाना और मिट्टी के बर्तनों में पारंपरिक तरीके से खाना बनाना ही उनकी दिनचर्या है।
सुरेंद्र सोरेन का कहना है: > “मेरे लिए यह जंगल ही मेरा घर और मेरा परिवार है। मैं यहीं पैदा हुआ, यहीं रह रहा हूँ और यहीं एक दिन दम तोड़ दूँगा। मुझे शहर की इस मतलबी दुनिया और उसकी चकाचौंध से कोई लेना-देना नहीं है। प्रकृति ही मेरी सब कुछ है और मुझे किसी भी बाहरी चीज की ज़रूरत नहीं है।”
सादगी की एक अनूठी सीख
स्थानीय लोग सुरेंद्र सोरेन का बेहद सम्मान करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सुरेंद्र सोरेन कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते। वे आत्मसम्मान और सादगी के साथ जीवन जीने की एक जीती-जागती मिसाल हैं।
आज के समय में जब लोग भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहे हैं और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, ऐसे में सुरेंद्र सोरेन की यह कहानी हमें सिखाती है कि खुश रहने के लिए महँगे गैजेट्स या आलीशान मकानों की नहीं, बल्कि मन की शांति और प्रकृति के साथ तालमेल की ज़रूरत होती है। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में, उन्होंने वास्तव में सादगी और आत्म-निर्भरता का एक अनूठा पाठ पढ़ाया है।



