में CM सुक्खू ने किया पुस्तक ‘City Limits’ का विमोचन; बोले– पहाड़ी शहरों में अंधाधुंध शहरीकरण पर आत्ममंथन की जरूरत, बढ़ रहा है आपदाओं का खतरा
डिप्टी मेयर टिकेंदर सिंह पंवार द्वारा संपादित पुस्तक के विमोचन पर जुटे नीति निर्माता और बुद्धिजीवी; मुख्यमंत्री ने शिमला के कायाकल्प के लिए गिनाए सरकार के बड़े प्रोजेक्ट्स।

27/05/2026-VIDYA SAGAR
शिमला। ऐतिहासिक गेयटी थियेटर (Gaiety Theatre) में आयोजित एक भव्य नीतिगत चर्चा और गरिमामयी समारोह में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शिमला नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर और प्रसिद्ध पर्यावरणविद् टिकेंदर सिंह पंवार द्वारा संपादित पुस्तक ‘City Limits – The Crisis of Urbanisation’ का विधिवत विमोचन किया। हिमालयन स्पोर्ट्स एंड कल्चरल यूथ सोसाइटी, शिमला के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में देश-प्रदेश के नीति निर्माताओं, पर्यावरणविदों, कानूनविदों और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया और पहाड़ी शहरों के अनियोजित विकास व बढ़ते पर्यावरणीय संकट पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
🌲 “बचपन से अब तक बदल गया शिमला, अब संभलने का समय” — मुख्यमंत्री
समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि प्रकृति ने हिमाचल प्रदेश को स्वच्छ हवा और पानी का जो अनमोल उपहार दिया है, उसकी रक्षा करना हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि शिमला ने पिछले कुछ दशकों में बहुत तेजी से बदलाव देखे हैं।
मुख्यमंत्री ने अपने संस्मरण साझा करते हुए कहा:-
“मैंने अपने बचपन से शिमला को बदलते देखा है। जिन क्षेत्रों में कभी घने और खूबसूरत जंगल हुआ करते थे, आज वे कंक्रीट के बहुमंजिला भवनों से ढक चुके हैं। पहाड़ों की भौगोलिक क्षमता (Carrying Capacity) अब जवाब दे रही है। अब हमें अंधाधुंध निर्माण को रोककर वर्टिकल कंस्ट्रक्शन (उर्ध्वाधर निर्माण) और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की सख्त जरूरत है।”
⚠️ क्लाउडबर्स्ट की बढ़ती घटनाओं पर मुख्यमंत्री की बड़ी चेतावनी
मुख्यमंत्री ने पर्यावरण असंतुलन की ओर इशारा करते हुए देश के अन्य राज्यों को भी सचेत किया। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश पिछले तीन वर्षों में दो बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है। अब बादल फटने (Cloudburst) की घटनाएं केवल ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निचले इलाकों में भी तबाही मचा रही हैं।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने खुलासा किया कि:-
“केंद्रीय गृह मंत्री के साथ हुई हालिया बैठक में भी मैंने यह गंभीर मुद्दा उठाया था कि आने वाले समय में यह संकट केवल हिमाचल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड और पूर्वोत्तर (Northeast) के राज्यों में भी ऐसी आपदाएं तेजी से बढ़ सकती हैं। इस पर वैज्ञानिक अध्ययन की तुरंत आवश्यकता है।”
उन्होंने पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों से भी जिम्मेदारी निभाने की अपील की और कहा कि बिना पार्किंग सुविधा के कई-कई गाड़ियां खरीदना और स्कूल टाइम पर लगने वाला ट्रैफिक जाम यह दर्शाता है कि हमें खुद के व्यवहार में भी आत्ममंथन करने की जरूरत है।
🏗️ शिमला के कायाकल्प और सस्टेनेबल मॉडल के लिए ₹1,545 करोड़ के प्रोजेक्ट्स
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पर्यावरण संतुलन को बिगाड़े बिना राजधानी शिमला के आधुनिकीकरण और सौंदर्यीकरण के लिए पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है:
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भूमिगत बिजली तारें (Underground Duct System): शहर की खूबसूरती को ग्रहण लगाने वाली ओवरहेड तारों के मकड़जाल को हटाने के लिए ₹145 करोड़ की लागत से अंडरग्राउंड डक्ट प्रणाली का निर्माण किया जा रहा है।
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आधुनिक सब्जी मंडी परिसर: वर्तमान सब्जी मंडी क्षेत्र का कायाकल्प करने और इसे आधुनिक रूप देने के लिए ₹600 करोड़ का निवेश किया जा रहा है।
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24 घंटे पेयजल आपूर्ति योजना: शिमला वासियों और सैलानियों को हर समय स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए ₹800 करोड़ की भारी-भरकम जल आपूर्ति योजना लागू की जा रही है।
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इसके अतिरिक्त, लिफ्ट क्षेत्र के पास एक सुगम अंडरपास का प्रस्ताव है और सर्कुलर रोड को चौड़ा करने के लिए भूमि अधिग्रहण का काम तेजी से चल रहा है। सरकार का लक्ष्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना नए सैटेलाइट टाउनशिप जैसे ‘हिम-चंडीगढ़’, ‘हिम-पंचकूला’ और कांगड़ा में ‘एयरो सिटी’ विकसित करना है।

📚 क्यों खास है पुस्तक ‘City Limits’?
पुस्तक के संपादक और पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंदर सिंह पंवार ने पुस्तक के मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मैदानी इलाकों के लिए बनाए गए शहरी नियोजन के मानक (Urban Planning Standards) संवेदनशील और नाजुक हिमालयी क्षेत्रों पर जबरन लागू नहीं किए जा सकते। वर्ष 2040 तक हिमाचल की लगभग 50% आबादी शहरी क्षेत्रों में सिमट जाएगी। इस पुस्तक का उद्देश्य कोई रेडीमेड समाधान देना नहीं, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में शहरीकरण और जलवायु संवेदनशीलता को लेकर एक लोकतांत्रिक और सार्वजनिक बहस को जिंदा करना है।
⚖️ “संस्थानों की जवाबदेही तय होना जरूरी” — जस्टिस चौहान
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान ने कहा कि शहरीकरण केवल जनसांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह समाज का पुनर्गठन है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि हमारे प्रशासनिक और नियोजन संस्थान इस तीव्र बदलाव के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहे हैं और इस विफलता की सबसे बड़ी कीमत समाज के सबसे कमजोर और गरीब वर्ग को चुकानी पड़ती है। इसलिए संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability) बेहद जरूरी है।
गरिमामयी उपस्थिति: इस ऐतिहासिक विमोचन के अवसर पर शिमला के मेयर सुरिंदर चौहान, मुख्यमंत्री के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान, शिक्षा सचिव राकेश कंवर, होम गार्ड्स की महानिदेशक (DG) सतवंत अटवाल, द ट्रिब्यून की ब्यूरो चीफ प्रतिभा चौहान सहित देश-विदेश के कई नामी नीति निर्माता और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।



