प्राकृतिक खेती से सुदृढ़ हो रही हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था; हमीरपुर में ₹8.64 करोड़ की लागत से बनी राज्य अवशेष परीक्षण प्रयोगशाला
देश का पहला राज्य बना हिमाचल, जो प्राकृतिक फसलों पर दे रहा है न्यूनतम समर्थन मूल्य; 2.56 लाख से अधिक किसान अपना चुके हैं शून्य बजट खेती, पांगी बना पहला प्राकृतिक उप-मंडल।

VIDYA SAGAR
शिमला, 12 जुलाई 2026
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हिमाचल प्रदेश की पावन माटी पर आज किसानों की समृद्धि और खुशहाली की एक नई इबारत लिखी जा रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के दूरदर्शी नेतृत्व और कल्याणकारी नीतियों के चलते प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्राकृतिक खेती (Natural Farming) के माध्यम से एक अभूतपूर्व मजबूती मिल रही है। राज्य सरकार न केवल प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा दे रही है, बल्कि किसानों के उत्पादों को सही दाम और वैज्ञानिक विश्वसनीयता दिलाने के लिए भी ठोस कदम उठा रही है।

MSP देने वाला देश का पहला राज्य: फसलों के दाम में भारी वृद्धि
हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है, जिसने प्राकृतिक खेती से तैयार की गई फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था की है। सरकार द्वारा इस मूल्य में वर्ष-दर-वर्ष उल्लेखनीय वृद्धि की जा रही है। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित खरीद दरें इस प्रकार हैं:
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गेहूं: ₹80 प्रति किलोग्राम
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मक्की: ₹50 प्रति किलोग्राम
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कच्ची हल्दी: ₹150 प्रति किलोग्राम
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पांगी घाटी की जौ: ₹80 प्रति किलोग्राम
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अदरक: ₹30 प्रति किलोग्राम
सरकार के इन ऐतिहासिक प्रयासों के कारण प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वित्त वर्ष 2024-25 में जहाँ 838 किसानों से 2123.58 क्विंटल गेहूं की खरीद की गई थी, वहीं इस रबी सीजन में ग्राफ बढ़कर 1,891 किसानों से 2,679.89 क्विंटल गेहूं तक पहुंच गया है।

हमीरपुर में ₹8.64 करोड़ की आधुनिक लैब: वैश्विक स्तर पर होगी गुणवत्ता की जांच
प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक आधार देने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए जिला हमीरपुर में ₹8.64 करोड़ की लागत से ‘राज्य अवशेष परीक्षण प्रयोगशाला’ (State Residue Testing Laboratory) स्थापित की गई है।
यह प्रयोगशाला अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक उपकरणों से लैस है, जो कृषि उत्पादों में मौजूद सूक्ष्म तत्वों और कीटनाशकों के अवशेषों का सटीकता से पता लगाने में सक्षम है। इस लैब के माध्यम से प्राकृतिक उत्पादों की गुणवत्ता और उनकी प्रमाणिकता (Authenticity) की वैज्ञानिक जांच की जाएगी, जिससे किसानों के ब्रांड को वैश्विक पहचान मिलेगी।

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पांगी बना पहला ‘प्राकृतिक उप-मंडल’; बड़ा भंगाल के राजमाह को मिलेगा GI टैग
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू जनजातीय क्षेत्रों के गुणवत्तायुक्त व पोषण से भरपूर खाद्यान्नों को विशेष पहचान दिलाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं:
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चंबा का पांगी उप-मंडल: इसे राज्य का पहला ‘प्राकृतिक खेती उप-मंडल’ घोषित किया गया है, जहाँ की हुडान, सुराल, किलाड़, सांच और सेचु पंचायतों के किसानों ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों का संरक्षण करते हुए जौ की बेहतरीन दामों पर बिक्री की है।
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बड़ा भंगाल क्षेत्र: मुख्यमंत्री ने अपने हालिया प्रवास के दौरान बड़ा भंगाल को ‘प्राकृतिक खेती पंचायत’ के रूप में विकसित करने और यहाँ उत्पादित होने वाले प्रसिद्ध राजमाह के लिए जीआई टैग (GI Tag) प्राप्त करने की दिशा में कार्य करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

2.56 लाख से अधिक किसान और अलग ‘मार्केटिंग विंग’ की तैयारी
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के 2,56,870 किसान कुल 44,784.73 हेक्टेयर भूमि पर शून्य बजट प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। इस पद्धति से न केवल लोगों की सेहत सुधर रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत व गुणवत्ता में भी बड़ा सुधार आ रहा है। प्राकृतिक उत्पादों के बेहतर विपणन और सुचारू बिक्री के लिए कृषि विभाग में एक अलग मार्केटिंग विंग (Marketing Wing) स्थापित करने की दिशा में भी तेजी से काम चल रहा है।
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निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश का प्राकृतिक खेती मॉडल आज पूरे देश के लिए एक प्रेरणास्रोत और नए प्रतिमान स्थापित करने वाला बन चुका है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुसंधान, व्यावहारिक प्रशिक्षण और हमीरपुर की नई अत्याधुनिक प्रयोगशाला के संगम से देवभूमि के किसान अब आत्मनिर्भरता और समृद्धि के एक स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर हैं।



