हिमाचल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
राज्य सरकार का विवादास्पद कानून "असंवैधानिक" घोषित

26/04/2026- VIDYA SAGAR
शिमला: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए, एक विवादास्पद कानून को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। अदालत ने इस कानून को “अवैध, मनमाना और असंवैधानिक” करार दिया। इस फैसले का दूरगामी असर होगा, विशेष रूप से राज्य के सरकारी कर्मचारियों पर।
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने सुनाया फैसला
मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति ज्योत्सना रीवाल दुआ की खंडपीठ ने कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इन याचिकाओं में ‘हिमाचल प्रदेश संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ते, शक्तियां, विशेषाधिकार और सुविधाएं) अधिनियम, 2006’ को चुनौती दी गई थी।
कानून को रद्द करने के कारण
अदालत ने अपने 100 से अधिक पृष्ठों के विस्तृत फैसले में इस कानून को रद्द करने के स्पष्ट कारण बताए:
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संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन: कोर्ट ने पाया कि राज्य विधानसभा के पास ऐसा कानून बनाने की विधायी क्षमता नहीं थी। यह कानून संविधान के अनुच्छेद 164 (1ए) का उल्लंघन करता है, जो मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करता है।
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संसदीय सचिवों की नियुक्ति अवैध: कानून के तहत संसदीय सचिवों की नियुक्ति को ‘लाभ का पद’ माना गया। कोर्ट ने कहा कि संसदीय सचिवों को मंत्री के समकक्ष दर्जा और सुविधाएं देना, अप्रत्यक्ष रूप से मंत्रियों की संख्या बढ़ाने जैसा है, जो असंवैधानिक है।
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न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप: कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि विधायिका, न्यायपालिका के फैसलों को ओवरराइड नहीं कर सकती। यह कानून पहले के अदालती फैसलों को निष्प्रभावी करने का एक प्रयास था, जिसे कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।
260 से अधिक कर्मचारियों को मिलेगी राहत
इस विवादास्पद कानून के तहत कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय और नियुक्तियां की गई थीं। कानून के रद्द होने से, इस अवधि के दौरान लिए गए उन सभी फैसलों पर सवालिया निशान लग गया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फैसले से 260 से अधिक उन कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जिनकी सेवाएं या पदोन्नति इस कानून के प्रावधानों से प्रभावित थीं। उदाहरण के लिए, कनिष्ठ कार्यालय सहायक (जेओए) आईटी के मामलों में, जहां नियुक्तियां लटकी हुई थीं या विवादित थीं, अब कोर्ट के फैसले के आलोक में नए सिरे से विचार किया जाएगा।
सरकार के लिए बड़ा झटका
यह फैसला मौजूदा सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी झटका है। संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को रद्द किए जाने से, न केवल प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होगा, बल्कि सरकार की छवि पर भी असर पड़ेगा।
क्या है अगला कदम?
राज्य सरकार के पास अब इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प है। महाधिवक्ता अनूप कुमार रतन ने कहा है कि सरकार फैसले का अध्ययन कर रही है और आगे की रणनीति तय करेगी।
विपक्ष ने साधा निशाना
विपक्ष ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे संविधान की जीत बताया है। भाजपा नेताओं ने मुख्यमंत्री सुक्खू से नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार ने जानबूझकर एक असंवैधानिक कानून को लागू रखा।
यह फैसला हिमाचल प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में एक नया मोड़ ला सकता है। कर्मचारियों के लिए यह न्याय की जीत है, जबकि सरकार के लिए यह अपनी गलतियों को सुधारने का एक मौका है।



