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गायब होता भराड़ीघाट और नानू जी की धुंधली यादें

विकास की रफ्तार में खो गए बचपन के निशान, लेकिन यादों की मिठास आज भी वैसी ही है

भराड़ीघाट (हिमाचल प्रदेश)।

कभी पहाड़ों की गोद में बसा शांत और खूबसूरत कस्बा भराड़ीघाट आज तेजी से बदलते विकास की तस्वीर पेश कर रहा है। चौड़ी होती सड़कें, कटते पहाड़ और गायब होते पुराने भवन आधुनिकता की कहानी तो कहते हैं, लेकिन इसी बदलाव के बीच कुछ ऐसी यादें भी दफन हो रही हैं, जिनकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती।



मेरे लिए भराड़ीघाट सिर्फ एक पड़ाव नहीं, बल्कि बचपन की उन अनमोल स्मृतियों का घर है जो आज भी दिल में जिंदा हैं। कई वर्ष पहले यहां एक ग्रामीण संचयिका बैंक हुआ करता था, जहां मेरे नानू जी प्रबंधक (मैनेजर) के पद पर कार्यरत थे। जब भी मैं उनके साथ यहां आता, बैंक के काम के बाद वे मुझे भराड़ीघाट का मशहूर मिल्क केक खिलाना कभी नहीं भूलते थे ।


आज जब भी बस या कार से इस मार्ग से गुजरता हूं, अनायास ही मेरी नजर उस पुराने बैंक भवन को खोजने लगती है। आंखें उस हरे रंग के गोल लोगो को तलाशती हैं, जिसमें दो हाथ एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते थे। ऐसा लगता है जैसे अगले ही पल सफेद पायजामा, चश्मा और टोपी पहने नानू जी मुस्कुराते हुए बाहर आएंगे और कहेंगे—

“चलो, आज फिर मिल्क केक खाते हैं।”

लेकिन अब न वह भवन है, न वह पहचान, और न ही वैसा भराड़ीघाट।



विकास की कीमत

विकास किसी भी समाज के लिए आवश्यक है, लेकिन जब विकास की कीमत हमारी विरासत, पुराने पेड़ों और यादों से चुकाई जाती है, तो एक खालीपन महसूस होता है। भराड़ीघाट में हुए बड़े बदलावों को देखकर कई बार ऐसा लगता है मानो किसी प्राकृतिक त्रासदी ने यहां की पुरानी पहचान मिटा दी हो।


कटते पहाड़, हटते वृक्ष और बदलते भू-दृश्य केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं हैं; वे उन हजारों कहानियों और भावनाओं का अंत भी हैं जो इन स्थानों से जुड़ी थीं।



प्रकृति का मौन संदेश

पहाड़ों को लगातार काटना और प्रकृति के संतुलन से छेड़छाड़ करना केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी भी है। जब प्रकृति अपना संतुलन खोती है, तो उसका परिणाम अक्सर विनाश के रूप में सामने आता है।


शायद यही कारण है कि भराड़ीघाट की बदलती तस्वीर देखकर मन में एक प्रश्न उठता है—क्या हम विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने में सफल हो पाए हैं?


यादें कभी नहीं मिटतीं

समय इमारतों को मिटा सकता है, सड़कें बदल सकता है और पहाड़ों का स्वरूप भी बदल सकता है, लेकिन यादों को कभी खत्म नहीं कर सकता।

भराड़ीघाट आज भले ही बदल गया हो, लेकिन वहां का मिल्क केक, ग्रामीण संचयिका बैंक का वह हरा लोगो और नानू जी के साथ बिताए वे छोटे-छोटे पल हमेशा दिल में जिंदा रहेंगे।

शायद यही वजह है कि हर बार भराड़ीघाट से गुजरते हुए सड़क किनारे खिड़की से बाहर देखते हुए मैं सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि अपने बचपन और नानू जी की मुस्कुराहट को खोज रहा होता हूं।


 

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