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शिमला: ‘प्रशासनिक आंकड़ों की संभावनाओं को उजागर करना’ विषय पर राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस का आयोजन

प्रोफेसर पी.सी. महालनोबिस की जयंती पर 20वां राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस मनाया गया; प्रधान सचिव डॉ. अभिषेक जैन ने किया विभागीय पुस्तकालय का उद्घाटन

VIDYA SAGAR

शिमला, 29 जून 2026

प्रख्यात सांख्यिकीविद् प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस की जयंती के उपलक्ष्य में आज हिमाचल प्रदेश में 20वां राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस धूमधाम से मनाया गया। भारत की आधुनिक सांख्यिकीय प्रणाली की नींव रखने वाले प्रोफेसर महालनोबिस के योगदान को याद करते हुए इस वर्ष का मुख्य विषय “प्रशासनिक आंकड़ों की संभावनाओं को उजागर करना” (Unlocking the Potential of Administrative Data) रखा गया। यह विषय साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण, प्रभावी शासन और नागरिक-केंद्रित सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने में प्रशासनिक आंकड़ों के बढ़ते महत्त्व को रेखांकित करता है।



📚 विभागीय पुस्तकालय का उद्घाटन और डेटा का महत्त्व

इस विशेष अवसर पर प्रधान सचिव (आर्थिक एवं सांख्यिकी) डॉ. अभिषेक जैन ने विभागीय पुस्तकालय का विधिवत उद्घाटन किया। यह पुस्तकालय विभाग में ज्ञान संसाधनों को सुदृढ़ करने के साथ-साथ अनुसंधान और डेटा-आधारित सीखने की संस्कृति को बढ़ावा देने में मदद करेगा।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. अभिषेक जैन ने कहा:-

“विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले प्रशासनिक आंकड़े देश की सबसे मूल्यवान, लेकिन वर्तमान में सबसे कम उपयोग की जाने वाली सार्वजनिक संपत्तियों में से एक हैं। यदि इन्हें व्यवस्थित रूप से संगठित, समन्वित और सुरक्षित रूप से साझा किया जाए, तो ये शासन को अधिक तीव्र, सटीक और साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सक्षम बना सकते हैं।”


🔄 पारंपरिक सर्वेक्षणों से आगे: वास्तविक समय (Real-Time) की जानकारी

प्रधान सचिव ने वर्तमान समय की जटिल विकासात्मक चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि अब सरकारों से त्वरित समाधान की अपेक्षा की जाती है। इसके लिए समयबद्ध और सूक्ष्म स्तर की जानकारी आवश्यक है, जो पारंपरिक सर्वेक्षण हमेशा उपलब्ध नहीं करा सकते। सरकारी कार्यक्रमों के नियमित क्रियान्वयन से उत्पन्न प्रशासनिक आंकड़े वास्तविक समय (Real-Time) में सतत जानकारी प्रदान करते हैं, जो नीतियों के निर्माण, निगरानी और मूल्यांकन को मजबूत बनाते हैं।



🛠️ सक्रिय निर्णय प्रणाली और तकनीकी एकीकरण

डॉ. जैन के अनुसार, प्रशासनिक डेटा शासन को केवल प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था (Reactive) से बदलकर एक सक्रिय निर्णय प्रणाली (Proactive Decision System) में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। इससे निम्नलिखित क्षेत्रों में सुधार होगा:

  • सटीक लक्ष्य निर्धारण: कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की सही पहचान।

  • संसाधनों का सही आवंटन: सार्वजनिक संसाधनों का समुचित उपयोग।

  • पारदर्शिता और जवाबदेही: भ्रष्टाचार पर रोक और मजबूत निगरानी प्रणाली।

उन्होंने समान डेटा शब्दावली, मानकीकृत वर्गीकरण और मेटाडेटा ढांचा विकसित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि सरकारी डेटा मशीन-पठनीय (Machine-Readable) बन सके।


🔒 डेटा सुरक्षा और गोपनीयता सर्वोपरि

तकनीकी प्रगति के साथ-साथ डॉ. जैन ने सचेत किया कि डेटा शासन पूरी तरह से गोपनीयता, सुरक्षा और सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। डेटा साझाकरण के लिए मजबूत कानूनी प्रावधान और स्पष्ट जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस संदर्भ में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम को उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण और सकारात्मक अवसर बताया।


🌐 केंद्र और राज्य की योजनाओं का समन्वय

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (भारत सरकार) के उप-महानिदेशक डॉ. जे. एस. तोमर ने भी कार्यक्रम में अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत सरकार प्रशासनिक डेटा के उपयोग के लिए कई अहम पहल कर रही है। आंकड़ों का समन्वयन उन्हें पुन: उपयोग के योग्य बनाता है। भविष्य का साक्ष्य-आधारित शासन पूरी तरह से डेटा की गुणवत्ता में सुधार, समान मेटाडेटा मानकों को अपनाने और सुरक्षित डेटा साझाकरण पर निर्भर करेगा।

कार्यक्रम के अंत में आर्थिक सलाहकार डॉ. विनोद राणा ने कहा कि विश्वसनीय प्रशासनिक डेटा अब केवल एक रिकॉर्ड नहीं रह गया है, बल्कि यह समावेशी विकास, जन विश्वास और लोकतांत्रिक शासन को सशक्त बनाने वाला एक बेहद महत्त्वपूर्ण संसाधन बन चुका है।

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