हिमाचल की समृद्ध बोलियां हमारी पहचान, साहित्यिक माध्यम से संरक्षण ज़रूरी: राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता
वरिष्ठ लेखक डॉ. ओ.पी. शर्मा ने राज्यपाल से भेंट कर अपनी कविता संग्रह ‘म्हारी सोच’ की प्रति सौंपी

23/05/2026-VIDYA SAGAR
शिमला। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने आज राज्य की समृद्ध बोलियों और अनूठी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश की विभिन्न स्थानीय बोलियां यहाँ की पहचान, लोक परंपराओं और जनमानस की सामूहिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक हैं। राज्यपाल ने आह्वान किया कि इन बोलियों को साहित्यिक और लिखित माध्यम से सहेजा जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर और गौरवशाली इतिहास से निरंतर जुड़ी रहें।
सांस्कृतिक पहचान हैं क्षेत्रीय बोलियां
राजभवन (लोक भवन) में आयोजित एक विशेष भेंट के दौरान राज्यपाल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश अपने अलौकिक प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ समृद्ध लोक परंपराओं, विविध भाषाओं और अनूठी सांस्कृतिक विविधता के लिए विश्व भर में जाना जाता है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि:
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कांगड़ी, मंडयाली, कुल्लवी, सिरमौरी और किन्नौरी जैसी क्षेत्रीय बोलियां प्रदेश की असली सांस्कृतिक पहचान हैं।
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इन बोलियों को लुप्त होने से बचाने के लिए साहित्य, गहन शोध तथा शैक्षणिक दस्तावेजों के माध्यम से निरंतर बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
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भाषाएं और बोलियां किसी भी जीवंत समाज की ‘आत्मा’ होती हैं।
“हमारी क्षेत्रीय बोलियों को लिखित रूप में सुरक्षित रखना हमारी सांस्कृतिक जड़ों को बचाने और आज के युवाओं तक अपनी समृद्ध विरासत पहुंचाने के लिए बेहद आवश्यक है।” — कविन्द्र गुप्ता, राज्यपाल
लेखक डॉ. ओ.पी. शर्मा ने भेंट की ‘म्हारी सोच’
इस अवसर पर हिमाचल के वरिष्ठ लेखक डॉ. ओ.पी. शर्मा ने राज्यपाल से शिष्टाचार भेंट की और उन्हें अपनी नवीनतम कविता संग्रह ‘म्हारी सोच’ की एक प्रति सप्रेम भेंट की। राज्यपाल ने डॉ. शर्मा द्वारा हिमाचली साहित्य के प्रचार-प्रसार और स्थानीय संस्कृति को संजोने में किए जा रहे प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की तथा उनके उज्ज्वल भविष्य और आगामी साहित्यिक रचनाओं के लिए हार्दिक शुभकामनाएं दीं।

सामाजिक चेतना जगाने में साहित्यकारों की भूमिका अहम
राज्यपाल ने समाज निर्माण में लेखकों और कवियों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्यिक कृतियां सामाजिक मूल्यों को गढ़ने और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई हैं। स्थानीय परंपराओं, लोक कलाओं और बोलियों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में साहित्यकारों का कार्य सराहनीय और उल्लेखनीय है।



