HRTC का नया फरमान: चालकों-परिचालकों के ‘परने’ पर लगी रोक; जनता बोली- “छवि कपड़े से नहीं, खटारा बसों से खराब हो रही है”
व्यावहारिक बनाम कागजी नियम: चालकों की असली चुनौतियाँ

24/05/2026-VIDYA SAGAR
शिमला/धर्मशाला हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम (HRTC) प्रबंधन ने प्रदेश भर के सरकारी बस चालकों और परिचालकों के लिए एक सख्त ड्रेस कोड लागू कर दिया है। निगम प्रबंधन द्वारा जारी नए आदेशों के मुताबिक, अब ड्यूटी के दौरान कोई भी ड्राइवर या कंडक्टर गले में किसी भी तरह का रंग-बिरंगा कपड़ा, पटका या ‘परना’ नहीं डाल सकेगा। इसके साथ ही सिर पर भी किसी प्रकार का कपड़ा बांधने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है।
निगम प्रबंधन का तर्क है कि इस तरह के पहनावे से जनता और पर्यटकों के बीच “अनुशासनहीनता” का संदेश जाता है और विभाग की छवि खराब होती है। लेकिन, इस आदेश के सोशल मीडिया पर आते ही आम जनता और कर्मचारियों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है।

क्या है नया सरकारी आदेश?
HRTC प्रबंधन की ओर से सभी क्षेत्रीय प्रबंधकों (RM) को निर्देश जारी किए गए हैं कि वे अपने-अपने डिपो में इस नियम का सख्ती से पालन सुनिश्चित करवाएं।
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चालकों और परिचालकों को निर्धारित खाकी और ग्रे रंग की वर्दी में ही ड्यूटी करनी होगी।
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टी-शर्ट या बिना वर्दी के आने वाले कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
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बस चलाते समय गले में पारंपरिक परना (गमछा) लटकाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
प्रबंधन का कहना है कि हिमाचल की बसें दिल्ली, चंडीगढ़ और हरिद्वार जैसे बाहरी राज्यों में भी जाती हैं, जहाँ लाखों पर्यटक सफर करते हैं। ऐसे में कर्मचारियों में एकरूपता दिखनी जरूरी है।
व्यावहारिक बनाम कागजी नियम: चालकों की असली चुनौतियाँ
इस आदेश के बाद सोशल मीडिया से लेकर बस अड्डों तक निगम के इस फैसले की तीखी आलोचना हो रही है। लोगों का कहना है कि जो अधिकारी वातानुकूलित (AC) कमरों में बैठकर नियम बनाते हैं, उन्हें लंबे रूटों पर गाड़ी चलाने वाले ड्राइवरों की जमीनी दिक्कतों का अंदाजा नहीं है।
पसीना और लंबा सफर: हिमाचल के पहाड़ी और मैदानी रास्तों पर गर्मियों के मौसम में चालकों को भारी उमस और पसीने का सामना करना पड़ता है। लंबे रूटों पर ड्यूटी के दौरान यह ‘परना’ ही पसीना पोंछने और खुद को तरोताजा रखने के काम आता है।
ढाबे का खाना और स्वच्छता: रूट पर चलने वाले कर्मचारी जब रास्ते में ढाबों पर खाना खाते हैं, तो हाथ-मुंह पोंछने के लिए इसी सूती कपड़े (परने) का सहारा लेते हैं। इसे पूरी तरह बैन करना अव्यावहारिक है।
जनता का तीखा सवाल: छवि परने से खराब हो रही है या ब्रेकडाउन से?
सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर लोगों का गुस्सा साफ देखा जा सकता है। यूजर्स का कहना है कि HRTC की छवि चालकों के गले के कपड़े से नहीं, बल्कि विभाग की अपनी कमियों से खराब हो रही है।
| विभाग का तर्क | जनता और कर्मचारियों का सवाल |
| परना या पटका पहनने से अनुशासनहीनता दिखती है। | आए दिन किसी न किसी मोड़ पर खड़ी खटारा और खराब बसें क्या अच्छी छवि बनाती हैं? |
| पर्यटकों के सामने निगम की छवि को सुधारना जरूरी है। | समय पर बसें न मिलना, बीच रास्ते में टायर पंक्चर होना या इंजन फेल होना छवि खराब करता है या ड्राइवर का गमछा? |
| ड्रेस कोड में एकरूपता अनिवार्य है। | पहले बसों के मेंटेनेंस और नई गाड़ियों की फ्लीट को सुधारने पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? |
निष्कर्ष: पहले बुनियादी कमियां सुधारें, फिर कपड़ों पर आएं
निगम में अनुशासन और वर्दी का सम्मान होना बेहद जरूरी है, इससे कोई इनकार नहीं करता। लेकिन क्या केवल ‘परना’ हटा देने से HRTC की सभी समस्याएं खत्म हो जाएंगी? जनता का साफ तौर पर मानना है कि प्रबंधन को पहले तकनीकी ढांचा सुधारने, समय पर स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने और बसों की हालत बेहतर करने पर ध्यान देना चाहिए। जब तक रूटों पर बसें खराब होना बंद नहीं होंगी, तब तक सिर्फ ड्रेस कोड बदलने से विभाग की छवि चमकाना नामुमकिन है।
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