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राज्यपाल ने मातृ-भाषाओं के संरक्षण और प्राचीन भारतीय लिपियों के पुनरुद्धार का किया आह्वान

भारतीय भाषाओं को सीखने से राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समझ होती है और सुदृढ़ः राज्यपाल

14 अक्तूबर, 2026

(Viren Thakur)

लोक भवन में ‘अक्षर से आत्मबोध तकः त्रिभाषा सूत्र’ पुस्तक का विमोचन किया

राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने अपनी मातृभाषा और स्थानीय बोलियों पर गर्व करने के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने और समझने के लिए तत्पर रहने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विश्वविद्यालयों से प्राचीन भारतीय लिपियों के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए शोध संबंधी पहल करने का भी आह्वान किया।

राज्यपाल आज लोक भवन में आयोजित ‘अक्षर से आत्मबोध तकः त्रिभाषा सूत्र’ पुस्तक के विमोचन समारोह में संबोधित कर रहे थे। इस पुस्तक की रचना प्रो. सत प्रकाश बंसल, इंदर सिंह ठाकुर, प्रो. सुमन शर्मा और डॉ. अशोक शर्मा द्वारा की गई है।

पुस्तक के लेखकों और इसके प्रकाशन से जुड़े सभी लोगों को बधाई देते हुए राज्यपाल ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की भाषा उसकी आत्मा, संस्कृति और सामूहिक चेतना को प्रतिबिंबित करती है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल भाषा और शिक्षा पर आधारित अकादमिक ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि भारत की संस्कृति को समझने, उसकी विरासत को संरक्षित करने और भविष्य को दिशा देने की एक सार्थक पहल है।

पुस्तक के शीर्षक के महत्व को रेखांकित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि अक्षर ज्ञान की शुरुआत हैं, शब्द विचारों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम हैं और विचार विवेक की नींव रखते हैं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य समझ, संवेदनशीलता, विवेक और आत्मबोध का विकास करना है। मातृभाषाएं सामूहिक स्मृतियों, सामुदायिक जीवन के अनुभवों और सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित रखती हैं।

राज्यपाल ने कहा कि भारत भाषाई और सांस्कृतिक रूप से विविधता से परिपूर्ण है। भारतीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि साहित्य, दर्शन, इतिहास, पारंपरिक ज्ञान और मानवीय मूल्यों की समृद्ध धरोहर भी हैं। हर भाषा में एक विशिष्ट दृष्टिकोण और अनुभवों का विशाल संसार होता है। उन्होंने कहा कि भारत की एकता की सुंदरता इस बात में नहीं है कि सभी लोग एक ही भाषा बोलें, बल्कि इसमें है कि विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, विचारों और भावनाओं का सम्मान करते हुए सभी एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहें।

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राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मातृभाषा में शिक्षा, भारतीय भाषाओं के संरक्षण और देश की सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसका प्रमाण राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में मिलता है। इसमें मातृभाषाओं, स्थानीय भाषाओं और बहुभाषी शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया गया है।

उन्होंने कहा कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना भारत की भाषाओं और संस्कृतियों को साझा राष्ट्रीय विरासत को समझने के लिए प्रेरित करती है। काशी तमिल संगमम् जैसी पहलें विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने और आपसी समझ को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखना एक नई सांस्कृतिक दुनिया के द्वार खोलने के समान है।

स्थानीय भाषाओं और बोलियों के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है। प्रदेश की लोक बोलियां, गीत, कहानियां और परंपराएं पहाड़ी समुदायों के अनुभवों, प्रकृति के प्रति उनकी संवेदनशीलता तथा पीढ़ियों से संचित ज्ञान को संरक्षित करती हैं।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करेगी तथा भारतीय भाषाओं, बहुभाषी शिक्षा और भारत की ज्ञान परंपराओं के अध्ययन को नई दिशा प्रदान करेगी।

इससे पहले, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति एवं पुस्तक के सह-लेखक प्रो. सत प्रकाश बंसल ने राज्यपाल का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक विद्यार्थियों को समाज और संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश देती है। भाषा और संस्कृति के बीच गहरे संबंध पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तक इस बात पर प्रकाश डालती है कि व्यक्ति समाज और राष्ट्र से जुड़कर किस प्रकार राष्ट्र निर्माण में सामूहिक योगदान दे सकते हैं।

इस अवसर पर मुकुल कांतिकर ने कहा कि भारत में भाषा भावनाओं और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि ‘अनेक भाषाएं, एक भाव’ का सिद्धांत भारतीय संस्कृति में एकता के मूल भाव को प्रदर्शित करता है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित शिक्षा सचिव राकेश कंवर ने कहा कि प्रदेश में त्रिभाषा सूत्र को प्रोत्साहित करने के लिए वर्षों से प्रयास किए जा रहे हैं और इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश के विद्यालयों में उर्दू और संस्कृत को अतिरिक्त भाषाओं के रूप में पढ़ाया जाता रहा है, जबकि कुछ विद्यालयों में पंजाबी भी पढ़ाई जाती है। हालांकि, इन भाषाओं का विस्तार अभी सीमित है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक प्रदेश में त्रिभाषा सूत्र के प्रभावी क्रियान्वयन को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।

इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला की कुलपति प्रो. प्रीति सक्सेना, राज्यपाल के सचिव संदीप भारद्वाज, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी और अन्य गणमान्य भी उपस्थित थे।

 

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