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हरियाली की गोद में सुकून की तलाश—मानसून की यादों को शब्दों में पिरोता एक रूहानी सफर

1998 में शिमला की वादियों से शुरू हुआ जुड़ाव आज भी जारी; प्रकृति प्रेमी, लेखक और अभिनेता धर्मिंदर ठाकुर के अनुभवों की एक अनकही दास्तान।

02/06/2026-VIDYA SAGAR

शिमला। प्रकृति के प्रति प्रेम किसी किताब या पाठशाला से नहीं सीखा जाता, बल्कि यह उन अनुभवों से जन्म लेता है जो इंसान की रूह को भीतर तक छू जाते हैं। लेखक और अभिनेता धर्मिंदर ठाकुर के लिए यह जुड़ाव वर्ष 1998 में शिमला की हरी-भरी वादियों से तब शुरू हुआ था, जब वह मात्र 12 वर्ष के थे। पहाड़ों की शांत फिज़ा, चीड़ के जंगलों से छनकर आती हवाएं, बादलों का वो मखमली स्पर्श और हरियाली की अनंत छटा ने उनके बाल मन में प्रकृति के प्रति एक ऐसा अटूट प्रेम जगाया, जो वक्त के साथ और गहरा होता चला गया।

पिछले 15 वर्षों के लंबे सफर के दौरान धर्मिंदर ठाकुर ने न केवल इन प्राकृतिक दृश्यों को अपनी कला और अभिनय में उकेरा, बल्कि पहाड़ों की इस असीम सुंदरता, शांति और आत्मिक ऊर्जा को अपनी डायरी के पन्नों पर शब्दों के माध्यम से जीवंत भी किया। उनके अनुसार, प्रकृति केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन को गहराई से समझने और महसूस करने का सबसे बड़ा माध्यम है।


मानसून की यादें: जब पहाड़ों ने ओढ़ी थी धुंध की चादर

अपनी यादों के झरोखे को साझा करते हुए लेखक बताते हैं कि बीते वर्षों के मानसून की यादें आज भी उनके मन में उतनी ही ताज़ा हैं। जब सावन की रिमझिम फुहारों के बीच ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों ने सफेद धुंध की रहस्यमयी चादर ओढ़ ली थी।

पहाड़ों में मानसून का आना किसी उत्सव से कम नहीं होता। जब बारिश की बूंदें सूखी मिट्टी पर गिरती हैं, तो उससे उठने वाली सोंधी महक इंसान को आधुनिकता की भागदौड़ से दूर अपनी जड़ों की ओर खींच लाती है। धर्मिंदर ठाकुर के लेख और संस्मरण इसी सुकून और आत्मिक शांति की तलाश को बयां करते हैं, जो आज के इस कंक्रीट के दौर में कहीं खो सी गई है।


प्रकृति संरक्षण का मूक संदेश

इस आलेख के माध्यम से लेखक केवल अपनी पुरानी यादें ही साझा नहीं कर रहे, बल्कि पहाड़ों के बदलते स्वरूप और पर्यावरण संरक्षण की ओर भी एक मूक इशारा कर रहे हैं। उनका यह सफरनामा हमें याद दिलाता है कि जिन पहाड़ों और वादियों से हम सुकून की उम्मीद करते हैं, उन्हें सहेजना और बचाए रखना भी हम इंसानों की ही जिम्मेदारी है। यह यात्रा आज भी जारी है—पहाड़ों के बीच, हरियाली के साए में, खुद को और खुदा को ढूंढने की यात्रा।


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