कॉर्पोरेट जगत में हलचल: अनुपम मित्तल की बड़ी मांग— कंपनियों में बंद हो अंग्रेजों के जमाने का ‘सैलरी सिस्टम’, महीने में दो बार मिले वेतन
"फ्री फूड और छुट्टियां तो दिखावा हैं, असली जरूरत समय पर पैसा है"; शादी डॉट कॉम के संस्थापक ने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए देश के मौजूदा पेरोल सिस्टम पर उठाए गंभीर सवाल।

VIDYA SAGAR
नई दिल्ली | 4 जून, 2026
’शार्क टैंक इंडिया’ के मशहूर जज और ‘शादी डॉट कॉम’ (Shaadi.com) के संस्थापक व सीईओ अनुपम मित्तल ने भारतीय कॉर्पोरेट जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। अनुपम मित्तल ने कंपनियों से अपील की है कि वे कर्मचारियों को महीने में एक बार नहीं, बल्कि दो बार सैलरी देने की व्यवस्था (Semi-Monthly Payments) शुरू करें। उन्होंने मौजूदा सैलरी पेमेंट के तरीके को ‘अंग्रेजों के जमाने का’ (British-Era System) बताते हुए इसकी तीखी आलोचना की है।
सोमवार को पेशेवर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन (LinkedIn) पर किए गए उनके इस पोस्ट ने इंटरनेट पर सनसनी मचा दी है। कर्मचारी वर्ग जहां इस मांग का खुलकर समर्थन कर रहा है, वहीं एचआर (HR) और पेरोल एक्सपर्ट्स के बीच इसे लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
“फ्री खाना और रिमोट वर्क सिर्फ दिखावा, कैश फ्लो ही असली सम्मान”
अनुपम मित्तल ने अपनी पोस्ट में कंपनियों के ‘कर्मचारी-केंद्रित’ (Employee-Centric) होने के दावों पर तंज कसा। उन्होंने लिखा कि आज के दौर में कंपनियां खुद को बेहतर दिखाने के लिए कर्मचारियों को ज्यादा छुट्टियां, मुफ्त खाना और घर से काम (रिमोट वर्क) जैसी सुविधाओं का लालच देती हैं। लेकिन, वे कर्मचारियों के जीवन से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे को नजरअंदाज कर देती हैं— और वह है समय पर सैलरी का भुगतान।
मित्तल ने देश के कामकाजी वर्ग की हकीकत बयां करते हुए लिखा:
”ज्यादातर कंपनियां अगले महीने की 7 तारीख को सैलरी देती हैं। कुछ 1 तारीख को देती हैं, लेकिन अगर उस दिन वीकेंड या छुट्टी हो, तो यह बढ़कर 2, 3 या 4 तारीख हो जाती है। कंपनियों के लिए एक हफ्ते की यह देरी सिर्फ एक ‘अकाउंटिंग डिटेल’ (कागजी प्रक्रिया) हो सकती है, लेकिन एक आम कर्मचारी के लिए इसका मतलब है— EMI का बाउंस होना, मकान मालिक की झिड़की सुनना या बिना वजह का मानसिक तनाव। भारत की बहुसंख्यक आबादी से पूछिए, वो आपको बताएंगे कि ‘कैश फ्लो ही इंसान का सम्मान है’ (Cash flow is dignity)।”
अनुपम मित्तल ने बताया कि उन्होंने केवल ज्ञान नहीं दिया है, बल्कि इसे अपनी कंपनी में लागू भी किया है। उन्होंने साझा किया कि कुछ साल पहले उन्होंने ‘Shaadi.com’ में यह फैसला लिया था कि कर्मचारियों की सैलरी अगले महीने के बजाय, चालू महीने की आखिरी तारीख को ही बैंक खातों में क्रेडिट कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि यह कोई ‘पर्क’ (अतिरिक्त सुविधा) नहीं बल्कि एक ‘सामान्य समझ’ (Common Sense) है।
15 और 30 तारीख को सैलरी देने का फॉर्मूला: GDP को भी मिलेगा बूस्ट
मित्तल ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कंपनियों को महीने में दो बार (हर महीने की 15 और 30 तारीख को) सैलरी देने का सुझाव दिया है। इस बदलाव से होने वाले फायदों को उन्होंने 4 मुख्य बिंदुओं में समझाया:-
कम होगा वित्तीय तनाव:
महीने में दो बार पैसे आने से कर्मचारियों को पूरे 30 दिन का लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा, जिससे उनका घरेलू बजट संतुलित रहेगा।
कर्ज के जाल से मुक्ति:
मिडिल क्लास कर्मचारियों को महीने के आखिरी हफ्तों में खर्च चलाने के लिए शॉर्ट-टर्म लोन या क्रेडिट कार्ड के जाल में नहीं फंसना पड़ेगा।
बाजार में बढ़ेगी लिक्विडिटी:
लोगों के हाथ में नियमित अंतराल पर पैसा होने से बाजार में खरीदारी की रफ्तार (Spending Velocity) बढ़ेगी।
अर्थव्यवस्था को फायदा:
जब खर्च बढ़ेगा, तो सीधे तौर पर देश की जीडीपी (GDP) को भी एक सकारात्मक बूस्ट मिलेगा।
”साल 2026 में यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है”
जब कुछ यूजर्स ने इस व्यवस्था को लागू करने में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों और एचआर टीम के बढ़ते काम का जिक्र किया, तो मित्तल ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने लिखा, “हां, मुझे पता है कि पेरोल टीमों को थोड़ी शिकायत होगी और काम बढ़ेगा। लेकिन साल 2026 के इस आधुनिक दौर में, जब हमारे पास इतनी बेहतरीन टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन मौजूद है, तो यह कोई रॉकेट साइंस (बहुत मुश्किल काम) नहीं है।”
मित्तल ने देश के सभी नौकरीपेशा लोगों से अपील की है कि वे अपने-अपने एचआर (HR) विभाग पर इस बदलाव के लिए दबाव बनाएं और इस औपनिवेशिक (अंग्रेजों के जमाने की) व्यवस्था को हमेशा के लिए खत्म करें।



