शिमला: भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आगाज़
भारतीय ज्ञान परम्परा और शास्त्रीय कलाओं के समकालीन स्वरूप पर देश-विदेश के दिग्गज विद्वान कर रहे हैं मंथन

VIDYA SAGAR
शिमला, 21 मई 2026: ऐतिहासिक राष्ट्रपति निवास स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS) में आज से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शन श्रृंखला का भव्य शुभारम्भ हुआ। “अभिजातकलाकलापेषु भारतीय-ज्ञान-परम्परा (सद्योवृत्तान्तः) : Tracing Roots of Bhāratīya Jñāna Paramparā in Contemporary Practice of Classical Arts” विषय पर आधारित यह विशेष आयोजन 21 मई से 23 मई 2026 तक चलेगा। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा, शास्त्रीय कलाओं और समकालीन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के बीच के गहरे संबंधों को टटोलना और नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से रूबरू कराना है।
संस्थान के भव्य ‘पूल थिएटर’ में आयोजित इस उद्घाटन सत्र की शुरुआत डॉ. शिखा समैया द्वारा किए गए वैदिक मंगलाचरण और डॉ. मनोज वर्मा एवं उनकी टीम के सुमधुर आवाहन गीत से हुई। इसके बाद मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत आरम्भ किया गया।

शास्त्रीय कलाएं मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति: प्रो. चतुर्वेदी
संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने अपने स्वागत भाषण में भारतीय कलाओं के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित किया। उन्होंने कहा:-
“भारतीय शास्त्रीय कलाएँ केवल मनोरंजन अथवा मंच पर प्रदर्शन की विधाएँ नहीं हैं, बल्कि वे हमारे चिंतन, दर्शन, अध्यात्म और लोकानुभूति की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। हमारी मूल चेतना ‘रस’ और ‘सौंदर्य’ के माध्यम से समाज को आत्मिक रूप से जोड़ती है।”
प्रो. चतुर्वेदी ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज के समय में भारतीय ज्ञान प्रणाली को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए कला, साहित्य, संगीत, स्थापत्य और दर्शन को एक समग्र (Holistic) दृष्टिकोण से देखना बेहद जरूरी है।

ग्लोबलाइजेशन के दौर में नई पीढ़ी को कलाओं के मूल स्वरूप से जोड़ना आवश्यक
संगोष्ठी की संयोजक और संस्थान की फेलो डॉ. उमा अनंतानी ने विषय प्रवर्तन करते हुए समकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के त्वरित और डिजिटल माध्यमों के दौर में युवा पीढ़ी अक्सर कलाओं के गूढ़ दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में भारतीय कलाओं के वास्तविक सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाना इस संगोष्ठी का मुख्य लक्ष्य है।

ग्रंथों और संग्रहालयों से बाहर आए भारतीय ज्ञान परम्परा: प्रो. सच्चिदानंद जोशी
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), नई दिल्ली के सदस्य सचिव एवं भारतीय विरासत संस्थान के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने अपने व्याख्यान से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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संवेदनशीलता की संवाहक: प्रो. जोशी ने कहा कि भारतीय कलाएँ अतीत की निर्जीव धरोहर नहीं, बल्कि समाज को संवेदनशीलता देने वाली जीवंत परम्पराएँ हैं।
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समय की मांग: उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल संग्रहालयों या प्राचीन ग्रंथों की अलमारियों तक सीमित रखने के बजाय, उसे आज की पीढ़ी के रोज़मर्रा के अनुभवों और जीवन व्यवहार से जोड़ना समय की सबसे बड़ी मांग है।

वर्चुअल माध्यम से जुड़ीं अध्यक्षा प्रो. शशिप्रभा कुमार, प्रो. उमा सी. वैद्य ने संभाला मंच
आईआईएएस की अध्यक्षा प्रो. शशिप्रभा कुमार ने वर्चुअल (ऑनलाइन) माध्यम से जुड़कर अपना अध्यक्षीय संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय कलाओं में हमारी जीवन-दृष्टि और सौंदर्य चेतना का अद्वितीय समन्वय है, जिसे समझने के लिए ‘अंतर्विषयी दृष्टिकोण’ (Interdisciplinary Approach) अपनाना होगा।
इस पूरे गरिमामयी सत्र का कुशल संचालन देश की प्रतिष्ठित विदुषी और संस्थान की टैगोर फेलो प्रो. उमा सी. वैद्य द्वारा अत्यंत विद्वत्तापूर्ण शैली में किया गया।
पहले ही दिन दिखे कई अनूठे रंग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर भी होगी चर्चा
उद्घाटन सत्र के बाद अकादमिक विमर्श का दौर शुरू हुआ:
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प्रो. महेश चंपकलाल ने “नाट्यशास्त्रीय परम्परा में संस्कृत नाटकों के समकालीन मंचन” पर अपने विचार रखे।
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पद्मभूषण डॉ. आर. गणेश ने ऑनलाइन माध्यम से “From Rasa to Rasika” विषय पर एक बेहद व्यावहारिक व्याख्यान दिया।
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दोपहर के सत्र में श्री प्रवीण कुमार, डॉ. वीणा लोंढे और डॉ. मालती एग्नेस्वरन जैसे प्रख्यात कलाकारों ने शास्त्रीय नृत्य, योग और संगीत के माध्यम से अद्भुत व्याख्यान-प्रदर्शन (Lecture-Demonstration) प्रस्तुत किए।
आगे क्या है खास? आगामी दो दिनों में इस संगोष्ठी के दौरान भारतीय नृत्य, संगीत, देवदासी परम्परा, भक्ति आन्दोलन के साथ-साथ ‘नई शिक्षा नीति (NEP)’ और ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)’ के दौर में भारतीय ज्ञान परम्परा की प्रासंगिकता जैसे बेहद आधुनिक विषयों पर भी देश-विदेश के दिग्गज शोधार्थी मंथन करेंगे।



